प्रस्तावना इतिहास और समकालीन भू-राजनीति एक स्पष्ट संकेत देती है: किसी भी राष्ट्र, समाज या व्यक्ति की स्थिरता केवल नैतिक आदर्शों से नहीं, बल्कि समग्र शक्ति से आती है। यह शक्ति एकांगी नहीं होती—इसमें सैन्य क्षमता के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, संस्थाएँ, कूटनीति, विज्ञान-तकनीक और सामाजिक एकजुटता शामिल होती है। ऐतिहासिक संदर्भ का संतुलन प्राचीन भारत में राज्यसत्ता और धर्म का संबंध कर्तव्य-आधारित था। बुद्ध का कथन—राजसैनिक को प्रवज्या न देना—राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। अशोक, गुप्त और हर्ष जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि विजय के बाद शांति का प्रचार तभी टिकता है जब राज्य की क्षमता अक्षुण्ण रहे। आधुनिक युग का पाठ 20वीं शताब्दी में अहिंसा ने राजनीतिक चेतना को दिशा दी, पर राज्य-निर्माण के लिए संस्थागत निरंतरता और सुरक्षा-क्षमता अनिवार्य रही। जहाँ संस्थाएँ कमजोर पड़ीं, वहाँ बाहरी दबाव, आर्थिक संकट और सामाजिक विखंडन ने राष्ट्रों को अस्थिर किया। वेनेजुएला जैसे उदाहरण बताते हैं कि केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि नीतिगत अनुशासन, आर्थिक प्रबंधन और संस्थागत शक्ति निर्णायक होत...
Osm
ReplyDeleteधन्यवाद बंधु !!
Deletevery awesome poetry
ReplyDeletethank you salunke ji
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